"क्या खोया और क्या पाया का हिसाब"
क्या खोया और क्या पाया का हिसाब न लगा पाया,
मन में बसा, एक अनकहा सवाल जिसने मन को दुखाया।
दिन बीतते गए, घर से दूर होता गया,
इस बार त्योहार में, वो रौनक ना देख पाया।
माँ ने मुझसे, मन से बातें भी ना की,
सपनों में हरपल,जो एक परछाई देखी।
पिता ने बात की चार बात, पर खुला न उनका राज़,
क्यों मन का भार, मुझसे कह ना पाए ऐसा क्या था आज।
इस बार दिवाली भी फीकी सी रह जायेगी,
माँ की ममता, दिल से दूरी क्या क्या और खो जाएगा
सोचता रहा हूं, इस दौड़ में मैं या वो क्या पाया?
क्या खोया मैंने, क्या पाया मैंने, हिसाब लगाया।
दूर रहा अपनों से, पर मंज़िल भी अधूरी है,
धन कमा लिया, पर मन की चाहत की दूरी है।
इस बार की दिवाली, बस यादों में रह जायेगी,
माँ के आशीर्वाद की कमी, दिल में कहीं चुभ जायेगी।
कभी तो लौट आऊँगा, उस आँगन में मैं फिर,
जहाँ खुशी की चिरागें, मन में जगमगाएँगी।
फिर माँ की आँखों में, प्यार का उजाला देखूँगा,
इस बार नहीं सही, पर अगली दिवाली में जरूर जाऊंगा।
✍️
रंजीत कुमार तिवारी।
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